Friday, April 15, 2011

तथाकथित चोरगुरू डा.अनिल कुमार उपाध्याय कार्रवाई से बचने के लिए कर रहे उपक्रम

नकल करके पत्रकारिता में एशिया का पहला डी-लिट.थिसिस लिखने के आरोपी डा.अनि कुमार उपाध्याय(Dr.Anil Kumar Upadhyay, Reader-Head , MahatmaGandhi KashiVidyaPeeth,Varanasi) कार्रवाई से बचने और प्रोफेसर बनने के लिए तरह तरह का उपक्रम कर रहे हैं। इसके लिए काशी से प्रयाग तक एक किये हुए हैं।नकल करके अपनी पी.एच-डी.थिसिस लिखने के आरोपी, इसी विश्वविद्यालय के एक अन्य पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर राम मोहन पाठक (Pro.RamMohanPathak) उनको साथ होने का भौकाल बना चढ़ा रहे हैं। कहा जाता है कि उपाध्याय पहले राम मोहन पाठक का बहुत विरोध करते रहे हैं, सो बड़ा गुरू पाठक अब फंसे उपाध्याय को सहानुभूति दिखाने व साथ होने का अभिनय करके और उलझा-फंसाकर अपना पुराना हिसाब चुकता करने में लगे हैं।

मालूम हो कि नकलचेपी आरोपी अनिल कुमार उपाध्याय ने कुलपति अवध राम(Pro.Awadh Ram) से प्रोफेसर पद पर प्रोन्नति होने की खानापूर्ति वाली साक्षात्कार तिथि 9 अप्रैल 2011 तय करा लिया था। अन्य की पुस्तक, शोध का पृष्ठ का पृष्ठ हूबहू उतारकर पी.एच-डी. व डी.लिट.थिसिस लिखनेवाले चोरगुरू अध्यापकों के तथाकथित संरक्षक कुलपति अवध राम ने, राममोहन पाठक और अनिल कुमार उपाध्याय के नकलचेपी कारनामों के खिलाफ बीते डेढ़ साल में कई बार सप्रमाण लिखित शिकायत के बावजूद, इन अध्यापकों( राम मोहन पाठक, अनिल कुमार उपाध्याय) के कदाचार के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की। और नहीं तो अनिल कुमार उपाध्याय को प्रोफेसर बनाने की तैयारी कर ली। इस सबकी जब प्रमाण सहित शिकायत राज्यपाल और यूजीसी में गया और वहां से जब नकल करके डि.लिट.थिसिस लिखने के आरोपी अनिल कुमार उपाध्याय को प्रोफेसर बनाने के लिए 9 अप्रैल 2011 को होने वाला साक्षात्कार रद्द करने का आदेश आया तब जाकर कुलपति अवध राम ने साक्षात्कार रद्द किया। वरना उसके पहले तो अवध राम नकल के आरोपी के लिए फैसिलिटेटर का ही कार्य किये। अब वही अवध राम इस आरोपी व उसके सहयोगी गुरूवों से कह रहे हैं कि देखिये मैंने तो इनको (पत्रकारिता में एशिया के एक मात्र डि.लिट. अनिल कुमार उपाध्याय को )प्रोफेसर बनाने के लिए सभी इंतजाम कर दिया था, लेकिन जब राज्यपाल और यूजीसी ने ही रोक दिया तो अब मैं क्या कर सकता।

कहा जाता है कि 8 अप्रैल 2011 को जब नकलचेपी आरोपी अनिल कुमार उपाध्याय को 9 अप्रैल 2011 को होने वाला उनका साक्षात्कार रद्द होने की सूचना मिल गई तो उन्होंने हर हाल में साक्षात्कार कराने के लिए लखनऊ से लगायत दिल्ली तक बहुत हाथ-पांव मारा। चर्चा है कि नकलचेपी आरोपी राम मोहन पाठक ने भी उनको वीर तुम बढ़े चलो के अंदाज में बढते रहने के लिए कहा और दिखाने के लिए कि हम भी इसघड़ी में आपके साथ हैं, यूजीसी में किसी का नम्बर डायल कर करके कहने लगे- भाई साहब,कृपया नामिनी को साक्षात्कार लेने के लिए भेजिए, रोकिये मत। चर्चा है कि नकलचेपी आरोपीयों ने कानूनविदों का भी दरवाजा खटखटाया। अन्य लोग भी तरह-तरह के सलाह दे रहे हैं।कोई सलाह दे रहा है मामा जी, इस मामले में आपको पाने के लिए कुछ भी नहीं है, जो है सब खोने के लिए ही है, आप की डि.लिट. की डिग्री रद्द हो सकती है, कदाचार के चलते आपकी नौकरी जा सकती है। कोई कह रहा है आप पत्रकारिता में एशिया के पहले डि.लिट. हैं,तथाकथित तमाम चोरगुरूओं के नेता हैं,लगाइये जुगाड़; कर दीजिए राज्यपाल,यूजीसी,कुलपति पर मुकदमा।आपलोग जैसे प्रतिभाशाली समर्थवान का कार्य किसी न किसी तरह से तो होगा ही।बता दें कि समरथ को नहीं दोष गोसाईं सो दोनो चोरी के आरोपी गुरू जुटे हुए हैं।

Saturday, April 9, 2011

राज्यपाल व यूजीसी ने नकलचेपी रीडर अनिल कुमार उपाध्याय को प्रोफेसर बनाने से रोका

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ,वाराणसी के पत्रकारिता विभाग के रीडर- हेड तथाकथित चोरगुरू अनिल कुमार उपाध्याय को प्रोन्नति करके प्रोफेसर बनाने की तैयारी सफल नहीं हो पायी। इस विश्व विद्यालय के तथाकथित चोरगुरू संरक्षक कुलपति प्रो.अवध राम ने सप्रमाण लिखित शिकायत के बावजूद , नकलचेपी अनिल कुमार उपाध्याय को प्रोफेसर बनाने की तैयारी कर ली थी। इसके लिए साक्षात्कार की खानापूर्ति 9 अप्रैल 2011 को की जानी थी। लेकिन इस बाबत और तथाकथित चोरगुरू अनिल उपाध्याय के नकलचेपी कारनामो की सप्रमाण शिकायत राज्यपाल ,मुख्यमंत्री,यूजीसी आदि के यहां पहुंच जाने और वहां से आदेश आ जाने के बाद साक्षात्कार रद्द करना पड़ा।एक अन्य अध्यापक की पी.एच-डी. थिसिस (शोध)से पन्ना का पन्ना हूबहू उतारकर अपनी डि.लिट. थिसिस लिखने ,फिर उसे किताब के रूप में भी दो बार छपवा लेने वाले रीडर हेड डा.अनिल कुमार उपाध्याय को 8 अप्रैल 2011 को साक्षात्कार रद्द किये जाने की पाती दे दी गयी। इसी विश्व विद्यालय के दूसरे पत्रकारिता विभाग के एक प्रोफेसर राममोहन मोहन पाठक पर भी नकल करके पी-एच.डी. थिसिस लिखने का आरोप है चर्चा है कि विश्व विद्यालय में राममोहन पाठक को बड़ा चोरगुरू और अनिल कुमार उपाध्याय को छोटा चोरगुरू कहा जाने लगा है। दोनो ही नकलची गुरू कई दिनो से हर तरह से लगे हुए थे कि किसी भी तरह से 9 अप्रैल 11 को साक्षात्कार प्रोमोशन हो जाय। इसके लिए जगह-जगह हाथ-पांव मार रहे थे।

Thursday, April 7, 2011

चोरगुरू अनिल उपाध्याय को प्रोफेसर बनाने की तैयारी किया चोरगुरू संरक्षक कुलपति अवध राम


यही हैं गुरू अनिल कुमार उपाध्याय
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के कुलपति प्रो.अवध राम को पत्रकारिता विभाग के रीडर हेड , डा. अनिल कुमार उपाध्याय के खिलाफ , प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह की पुस्तक से नकल करके डी.लिट.की थिसिस लिखने और बाद में उसे पुस्तक के रूप में छपवाने की प्रमाण सहित लिखित शिकायत दी गई है। लेकिन इस चोरगुरू संरक्षक कुलपति ने उसकी तय समय में ठीक से जांच कराने के बजाये, चोरगुरू डा. अनिल कुमार उपाध्याय को 09अप्रैल 2011 को प्रोफेसर बनाने की तैयारी कर लिया है। अवध राम का कुलपति पद पर कार्यकाल 14 जुलाई 2011 को पूरा हो रहा है। उसके पहले यह चोरगुरू संरक्षक कुलपति अपने चहेते चोरगुरू डा.अनिल उपाध्याय को उसी तरह बचाता रहा है जैसे म.गां.अं.हि.वि.वि.वर्धा का छिनाली फेम पुलिसिया कुलपति विभूति नारायण राय अपने सजातीय चोरगुरू अनिल कुमार राय अंकित उर्फ अनिल के.राय अंकित को,वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल वि.वि.,जौनपुर के चोरगुरू संरक्षक पूर्वकुलपति आर.सी.सारस्वत (सारस्वत 22 नवम्बर 10 को सेवानिवृत हुए ) वि.वि. के अपने चार चहेते चोरगुरूओं को,उनकी लिखी किताबों को छापने व सप्लाई करने वाले को, अवधेश प्रताप वि.वि. रीवा के चोरगुरू संरक्षक कुलपति यादव अपने चहेते एक एक प्रोफेसर चोरगुरू को बचाते रहे हैं।

चोरगुरू संरक्षक कुलपति अवध राम की चोरगुरू अनिल कुमार उपाध्याय को प्रोफेसर बनाने की तैयारी की खबर जनसत्ता अखबार के लखनऊ संस्करण में 7 अप्रैल 2011 को छपी है -


नकल करने वाले को प्रोफेसर बनाने की तैयारी!

काशी विद्यापीठ में राज्यपाल और मुख्यमंत्री से दखल देने की अपील

-आशुतोष सिंह

लखनऊ, 6 अप्रैल। एक विश्वविद्यालय और पत्रकारिता के दो संस्थान। एक संस्थान का अध्यक्ष दूसरे संस्थान के अध्यक्ष की किताब की नकल करके नई किताब लिख देता है। मामला उजागर होने के बाद नकल करने वाले को कोई सजा देने के बजाए उसे तरक्की देने की कवायद शुरु हो चुकी है। आज इस मुददे को लेकर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी और मुख्यमंत्री मायावती से दखल देने की मांग की गई। यह मामला है वाराणसी के काशी विद्यापीठ का। जिसमें महामना मदन मोहन मालवीय संस्थान के निदेशक प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह ने काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के रीडर अनिल कुमार उपाध्याय पर अपनी पुस्तक संचार माध्यमों का प्रभाव की सामग्री को चोरी कर अपनी पुस्तक प्रकाशित करने का आरोप लगाया था। इस मामले की जांच पड़ताल लंबित है। इस बीच आरोपी शिक्षक अनिल कुमार उपाध्याय को रीडर से प्रोफेसर बनाने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है।

दूसरे की पुस्तक की सामग्री को लेकर अपने नाम से प्रकाशित कराने के आरोपों से घिरे काशी विद्यापीठ के रीडर अनिल कुमार उपाध्याय की तरक्की रोकने के लिए आज उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री मायावती से अपील की गई। यह अपील संपूर्ण परिवर्तन जनसंगठन के मुखिया कैलाश गोदुका ने की। गोदुका कई वर्षो से आमजन से जुड़े लोगों का सवाल उठाते रहे हैं और एक दौर में आरटीआई विशेषज्ञ अरविंद केजरीवाल उनके साथ काम कर चुके है। गोदुके ने आज जो ज्ञापन भेजा है उसमें कहा गया है कि डाक्टर अनिल कुमार उपाध्याय का प्रमोशन रोका जाए क्योंकि उन्होने दूसरे की पुस्तक से सामग्री चोरी कर अपनी पुस्तक प्रकाशित की है।

गोदुका ने अपने ज्ञापन में आगे कहा कि प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह, महामना मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता संस्थान में प्रोफेसर, निदेशक के पद पर कार्यरत है। प्रोफेसर सिंह की पुस्तक ‘‘संचार माध्यमों का प्रभाव’’ का प्रकाशन, नई दिल्ली से वर्ष 1993 में हुआ है जिसका कापीराइट प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह के पास है। जबकि महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग में रीडर पद पर कार्यरत डाक्टर अनिल कुमार उपाध्याय वाराणसी की पुस्तक ‘‘पत्रकारिता एवं विकास संचार’’ प्रथम संस्करण वर्ष 2000-2001, में प्रकाशित हुआ।

प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह का आरोप है कि डाक्टर अनिल कुमार उपाध्याय ने प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह की पुस्तक संचार माध्यमों का प्रभावमें प्रकाशित सामग्री को चोरी करके अपनी पुस्तक पत्रकारिता एवं विकास संचारमें हूबहू प्रकाशित कर लिया।

संचार माध्यमों का प्रभावके सबसे महत्वपूर्ण भाग अध्याय 2 के पृष्ठ 70 से 74 व पृष्ठ 97 से 100 पर छपी सामग्री और पृष्ठ 73, 78 एवं 100 पर मुद्रित चार माडल जो प्रोफेसर सिंह ने विकसित किए थे धोखे से ज्यों का त्यों चुराकर अपनी पुस्तक पत्रकारिता एवं विकास संचारके प्रथम संस्करण के क्रमशः पृष्ठ संख्या 66 से 69 व पृष्ठ संख्या 103 से 105 तक प्रकाशित कराया है।

गोदुका ने अपने ज्ञापन में कहा है कि डाक्टर अनिल कुमार उपाध्याय ने अपनी डीलिट में भी चोरी कर संदर्भ लिखे है क्योंकि डाक्टर अनिल कुमार उपाध्याय की पुस्तक ‘‘पत्रकारिता एवं विकास संचार’’ डी.लिट की ही थ्रीसिस का प्रकाशन है। यह मामला पहले भी कई बार राज्यपाल एवं कुलाधिपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के सामने पेश किया जा चुका है और इस पर जांच लंबित है।

ज्ञापन में राज्यपाल से अनुरोध किया गया है कि चोरी कर पुस्तक लिखने वाले डाक्टर अनिल कुमार उपाध्याय को इस प्रकरण के निस्तारण तक कोई प्रमोशन न दिया जाए।गोदुका ने इस मामले में जनसत्ता से कहा- सवाल यह है कि जब एक शिक्षक खुद दूसरे शिक्षक की पुस्तक की सामग्री चुरागाएगा तो वह अपने छात्रों को क्या शिक्षा देगा।

Tuesday, March 22, 2011

काल तुझसे होड़ है मेरी- आलोक तोमर



आलोक तोमर ने यह कविता 11 फरवरी 2011 को लिखी थी।

Monday, March 21, 2011

आलोक तोमर का अंतिम लेख



आलोक तोमर ने यह लेख 17 मार्च 2011 को सुबह लगभग साढ़े 11 बजे लिखा, जिसके आधे घंटे बाद कोलैप्स हो गये

एक क्रिकेट विरासत की पतन गाथा
आलोक तोमर
मध्य प्रदेश में इंदौर और ग्वालियर में क्रिकेट के विश्व स्तरीय मैच हो जाते हैं और वहां भी बाकी देश की तरह खूब भीड़ होती है। ग्वालियर में अब तक हॉकी के सितारे और मेजर ध्यानचंद्र के भाई कैप्टन रूप सिंह के नाम पर बने स्टेडियम को ही क्रिकेट का स्टेडियम बना लिया जाता है और दिवंगत माधव राव सिंधिया ने दिन रात खेलने लायक बनाने के लिए रौशनियों का इंतजाम यहां कर दिया था। माधव राव सिंधिया क्रिकेट के पीछे इतने दीवाने थे कि उसके लिए मंत्रिमंडल की बैठक छोड़ सकते थे और अपने जन्मदिन के समारोह छोड़ सकते थे। छोड़ते भी थे।
इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के वे लगभग हमेशा अध्यक्ष रहे और बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर भी मध्य प्रदेश से पहुंचने वाले वे अकेले पात्र थे। यह बात अलग है कि उनके उस चुनाव में दबा कर राजनीति हुई थी और शायद एक या दो वोट से उन्होंने क्रिकेट का सिंहासन अर्जित किया था। इस वोट के पीछे कोलकाता में रह चुके अमर सिंह का हाथ बताया जाता है और वोट भी जगमोहन डालमिया का बताया गया है और शायद यही वजह थी कि अमर सिंह को शुरूआती राजनीति में चंबल घाटी के मुरैना तक से जमाने में माधव राव सिंधिया ने पूरी रुचि दिखाई। वह तो अगर श्री सिंधिया बने रहते या उनके जाने के बाद कांग्रेसियों ने अमर सिंह को भाव दिया होता तो वे शायद मुलायम सिंह यादव के पास कभी नहीं जाते।
बाद में माधव राव सिंधिया ने पत्रकारिता से उठा कर राजीव शुक्ला को क्रिकेट की राजनीति में जगह दी और यह राजीव शुक्ला की प्रबंधन और राजनैतिक क्षमता का ही कमाल है कि शरद पवार के क्रिकेट दिग्विजय काल में वे पूरी ताकत से बने हुए है और अब तो ललित मोदी और बाकी बड़े बड़े खिलड़ियों से पंजा लड़ाने की मुद्रा में आ गए हैं। माधव राव सिंधिया खुद भी खेलते थे और उनकी पीढ़ी के बिशन सिंह बेदी और गावस्करों से पूछो तो बुरा नहीं खेलते थे। वे राजनीति की शतरंज के लिए बने ही नहीं थे और क्रिकेट जैसी खुले हाथ वाली राजनीति करते करते अचानक चले गए।
अब माधव राव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। उन्हें किसी ने क्रिकेट खेलते नहीं देखा। वैसे पढ़े लिखे आदमी है। हावर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ चुके हैं, स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय से एमबीए कर चुके हैं और दुनिया भर का कारोबार तय करने वाली मैरिल लिंच और मोर्गन स्टेन्ले जैसी वित्तीय मूल्यांकन संस्थाओं में बड़े पदों पर काम करने के अलावा संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक प्रकोष्ठ में प्रशिक्षण ले चुके हैं।
मगर क्या यही योग्यताएं ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्य प्रदेश क्रिकेट का प्रशासन चलाने के लिए पात्र बनाती है। क्या इंदौर के जमीनी नेता और राम कथा से ले कर नगर निगम कथा तक में पारंगत कैलाश विजयवर्गीय को हराने भर से यह स्थापित हो जाता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया क्रिकेट की राजनीति में भोपाल से आगे बढ़ेंगे और मध्य प्रदेश में भी क्रिकेट को उनसे बहुत ज्यादा उम्मीद करनी चाहिए। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में आनंद शर्मा ने जितना काम दिया है वही करते रहे तो उनके अपने लिए और शायद देश के लिए भी ठीक रहेगा।
मध्य प्रदेश में क्रिकेट की विरासत अच्छी खासी रही है और अगर ठीक से चलाया जाता तो मध्य प्रदेश की टीम तो अच्छा करती ही, देश की टीमें भी मध्य प्रदेश से बहुत लोग हो सकते थे। 1934 मे रणजी ट्राफी खेलने के लिए मध्य भारत की एक टीम बनाई गई थी और इसी तरह की दूसरी टीम 1939- 40 में बनाई गई। उस समय के राज परिवार होल्कर ने मध्य भारत की टीम के संयोजन का काम संभाला और खुद महाराजा यशवंत राव होल्कर 14 साल तक इस टीम के मैनेजर बने रहे। इस टीम में सी के नायडू और मुश्ताक अली जैसे खिलाड़ी थे और मध्य प्रदेश की टीम में रणजी चार बार जीती और छह बार रनर्स अप रहे। अब तो मध्य प्रदेश की टीम को रणजी के फाइनल में आए भी जमाना बीत गया है।
मध्य प्रदेश ने टीम के तौर पर 1950 में खेलना शुरू किया और महाराजा होल्कर 1954 और 1955 तक रणजी मैचों मे नजर आते रहे। फिर एक बार मध्य भारत टीम बनी मगर दो साल बाद इसे फिर मध्य प्रदेश में बदल दिया गया। मध्य भारत के मुख्यमंत्री रहे लीलाधर जोशी गोपीकृष्ण विजयवर्गीय और तख्तमल जैन की क्रिकेट में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। यह बात अलग है कि ऑफ स्पीनर चंदू सर्वटे 1946 से 1952 तक 9 बार भारत की टीम में पूरी दुनिया में खेले। मुश्ताक अली जैसे ऐतिहासिक रूप से प्रतिभाशाली खिलाड़ी और हीरा लाल गायकवाड़ भी भारतीय क्रिकेट के इतिहास में रहेंगे।
राजेश चौहान 21 बार भारत के लिए खेले और 47 विकेट ले कर यह साबित किया कि मध्य प्रदेश की जमीन में क्रिकेट की विरासत के लिए जगह है। नरेंद्र हिरवानी उत्तर प्रदेश से आ कर मध्य प्रदेश की टीम में शामिल हुए और पहले दर्जे की क्रिकेट में चार सौ से ज्यादा विकेट ले कर दिखाएं। वैसे संदीप पाटिल और चंद्रकांत पंडित जैसे खिलाड़ी भी मध्य प्रदेश की टीम के कैप्टन रह चुके हैं और अमय खुरसैया और नमन ओझा तो भारत की ओर भी खेल चुके हैं। इस विरासत का ज्यादातर हिस्सा मालवा और खास तौर पर इंदौर के पाले में जाता है मगर मध्य प्रदेश की क्रिकेट पर राजनैतिक दावेदारी फिलहाल ग्वालियर की है। होनी इंदौर की चाहिए थी मगर क्रिकेट शायद साहबों का खेल है और विश्व के सर्वश्रेष्ठ महापौरों की कतार में दो बार आ चुके कैलाश विजयवर्गीय तीन पीस का सूट और टाई नहीं पहनते और शायद इसीलिए अभिजात क्रिकेट के मैदान में नाजुक मिजाज ज्योतिरादित्य ज्यादातर अफसरों और क्लबों के वोटों से उन्हें हरा कर चले जाते हैं।
यह भाजपा और कांग्रेस के बीच का मामला नहीं है। आखिर भाजपा के बड़े नेता अरुण जेटली दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष है और यह बात अलग है कि वे बड़े वकील है और दक्षिण दिल्ली में रहने के अलावा शान से टाई वगैरह पहनते हैं। इंदौर के संदीप जोशी का नाम कम लोग जानते होंगे मगर क्रिकेट के दीवाने संपादक प्रभाष जोशी के इस बेटे ने वर्षों लंदन में काउंटी खेली है और कपिल देव से ले कर बड़े बड़े दिग्गजों के विकेट उड़ाए हैं। ऐसी प्रतिभाओं की तो गिनती ही नहीं है।
मध्य प्रदेश में क्रिकेट नहीं पनपेगी तो अंधेरा नहीं छा जाएगा मगर जब क्रिकेट के सितारे इलाहाबाद और बड़ोदरा के गली मोहल्लो के मैदानों से आ सकते हैं तो जहां पूरी विरासत हैं, संभावना हैं और दीवानगी हैं वहां क्रिकेट का विस्तार और सफलता की स्थापना क्यों नहीं हो सकती? ज्योतिरादित्य सिंधिया के बारे में सुनते हैं कि वे अब मध्य प्रदेश की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी लेने वाले हैं और उनका सपना मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा कांग्रेसी नेता बनने का है तो ऐसे में क्रिकेट को वे आखिर किससे सहारे छोड़ रहे हैं और क्या कभी इंदौर, ग्वालियर, भोपाल के किसी लड़के को हम क्रिकेट का सितारा बनता देखेंगे?
(शब्दार्थ)

Sunday, March 20, 2011

हमारे मन का आलोक गया


आलोक गया । लगभग 11 बजे ।
-राहुल देव
(राहुल भैया का यह हृदय विदारक संदेश 11 बजकर 40 मिनट पर आया)

Thursday, March 17, 2011

प्रख्यात पत्रकार आलोक तोमर की तबियत बहुत खराब


-सत्ताचक्र-

देश के प्रख्यात हिन्दी पत्रकार व सत्ताचक्र के संरक्षक आलोक तोमर की तबियत आज सुबह से बहुत खराब हो गई है। वह बत्रा अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में वेंटिलेटर पर हैं।