Sunday, August 3, 2014

HINDI WRITERS AGAINST CSAT



सी-सैट खत्म करने की मांग को लेकर हिन्दी साहित्यकार भी होने लगे एकजुट
- कृष्णमोहन सिंह
नई दिल्ली। लोकसेवा आयोग की परीक्षा से सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट (सी-सैट) हटाये जाने की मांग के मामले में बहुत दिनों तक मुंह बंद किये रहने के बाद अब हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकारों में भी गुस्सा बढ़ने लगा है। साहित्यकारों में इस मुद्दे पर दलगत राजनीति के झगड़े में पड़े बिना, सी-सैट को  खत्म किये जाने की मांग को लेकर सहमति बनने लगी है। इसके लिए केन्द्र सरकार को पत्र  लिखने, सी-सैट को खत्म करने की अपील करने के लिए विचार-विमर्श शुरू हो गया है। और यदि  24 अगस्त को होने वाली सिविल प्रीलीम परीक्षा हो जाने पर उसे आधार बनाकर सी-सैट पैटर्न पर ही इस साल परीक्षा कराने की शातिर चाल चलने की कोशिश यूपीएससी कर रहा है तो 24 वाली परीक्षा रद्द करने या सी-सैट खत्म किये जाने तक आगे  टालने की मांग पर भी विचार हो रहा है। ताकि इस साल की परीक्षा सी-सैट लागू होने से पहले वाले पैटर्न पर हो सके। देश के मूर्धन्य हिन्दी साहित्कारों का मानना है कि यूपीएससी आटोनामी के नाम पर पर मनमानी कर रहा है। वह कैसे और किसकी शह पर बयान दे रहा है कि ना तो सी-सैट का पैटर्न बदलेगा नाही 24 अगस्त को होने वाली परीक्षा टलेगी। कई साहित्यकारों ने तो आपसी बातचीत में यूपीएससी के पदाधिकारियों व सदस्यों की नियुक्तियों पर भी उंगली उठाई और कहा कि इनमें ज्यादेतर  सेटिंग व जुगाड़ और राजनीतिक नियुक्ति वाले बैठे हैं। सोनिया – मनमोहन सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय में काबिज मलयाली लाबी ने सोनिया –मनमोहन जैसे अंग्रेजी प्रेमियों को खुश करने और दक्षिणभारत के छात्रों पर भारी पड़ने लगे  हिन्दी भाषी राज्यों के छात्रों को शातिर तरीके से सिविल सेवा परीक्षा में सफल नहीं होने देने के लिए सी-सैट पैटर्न लागू कराया। इसे लागू होने पर जब परिणाम आया तो हिन्दी भाषी राज्यों के छात्रों का काफी हद तक सफाये का प्रमाण , इसके विरोध का कारण बना । इससे यह साबित हो गया कि सोनिया – मनमोहन और उनके अंग्रेजीदा अफसरों व यूपीएससी के बाबूओं द्वारा साजिशन लागू कराया  गया सी-सैटी हथियार हिन्दी भाषी छात्रों के विरूद्ध बहुत ही कारगर साबित हो रहा है। रही –सही कसर सिविल परीक्षा में अंग्रेजी का बहुत ही गलत और उल्टा –पुल्टा हिन्दी अनुवाद कराकर पूरा कर दिया जा रहा है। लेकिन यह कराने वाले यूपीएससी चैयरमैन व अन्य अफसरों सदस्यों को अब तक हटाया नहीं गया। जबकि इसके चलते सैकड़ों परीक्षार्थियों का जीवन बर्बाद हो गया।
अचरज यह है कि जिस कांग्रेसी सरकार के समय यह सी-सैट लागू हुआ आज सत्ता से बाहर होने पर वही कांग्रेस और उसका छात्र संगठन इस सी-सैट के विरोध में अपने नेताओं के घर के सामने नहीं , भाजपा के सत्ताधारी नेताओं के घर के सामने धरना –प्रदर्शन कर रहे हैं।
और जिस भाजपा की केन्द्र में सरकार है उसका छात्र संगठन - अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भी सी-सैट को खत्म करने के लिए धरना दे रही है। इस तरह गजब तमाशा हो रहा है। संसद के दोनों सदनों में इसे सपा,राजद,जदयू वाले जोर-शोर से उठा रहे हैं। इस मामले अभी तक हिन्दी के नामी लोग इस उम्मीद में चुप्पी साधे हुए थे कि नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान  और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी हिन्दी को बढ़ावा देने की बात कही थी, सो वह अपने बचन का पालन जरूर करेंगे ।और त्वरित गति से करेंगे। लेकिन इतने दिन तक इस मामले को वर्मा कमिशन की रिपोर्ट आने के नाम पर टाला गया और जब सोनिया-मनमोहन सरकार द्वारा नियुक्त वर्मा समिति की सी-सैट की तरफदारी वाली तथाकथित रिपोर्ट की बात सामने आई तब साहित्यकारों में इस पर आवाज उठाने की बात होने लगी है। इनमें से कईयों का कहना है कि जिस यूपीए सरकार ने सी-सैट लागू किया उसके द्वारा अपने जीहजूर पूर्व अफसरों वाली समिति बनाई गई, ऐसे में वह वर्मा समिति कैसे यूपीए सरकार के समय लागू सी-सैट के विरूद्ध रिपोर्ट देती। या तो उस 3  सदस्यीय वर्मा समिति में  मोदी सरकार अपने 4 लोगों को रखकर उसे 7 सदस्यीय बना दी होती और एक हप्ते में रिपोर्ट मांग लेती , देखते वह रिपोर्ट सी-सैट को खत्म करने वाली आ जाती। लेकिन लगता है इस सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय में काबिज यूपीए सरकार के समय के अफसर ऐसा चाहते नहीं थे। इन सब वजह से हिन्दी साहित्यकारों में  अब केन्द्र सरकार को पत्र लिख, जनता से  अपील कर,  सी-सैट को जल्दी खत्म करने की मांग पर सहमति बनने लगी है। इस बारे में प्रसिद्ध कहानीकार काशी नाथ सिंह का कहना है कि इसके लिए वह कुछ साहित्यकारों से  बात कर रहे हैं। 
*यह खबर हिन्दी दैनिक "पंजाब केसरी" दिल्ली में 03-08-2014 को पेज 7 पर व अन्य कई राज्यों के समाचार पत्रों में छपी है।

Thursday, June 26, 2014

MHRD KE AFASARON KI SHAH PAR AKARE HUYE HAIN D.U. KE V.C. DINESH




दिल्ली वि.वि. का 4 वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम , पूरे देश में थी लागू करने की योजना

मंत्रालय के कुछ अफसरों की शह पर अकड़े व अड़े रहे हैं दिनेश सिंह
 - कृष्णमोहन सिंह
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के 4 वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को खत्म करके फिर से 3 वर्षीय करने में  कुलपति  दिनेश सिंह यूं ही नहीं हिला - हवाली कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्चशिक्षा सचिव अशोक ठाकुर , उच्च शिक्षा संयुक्त सचिव आरपी सिसोदिया की शह के चलते दिनेश सिंह इतने दिन तक अड़े व अकड़े रहे हैं। इसमें पूर्व यूजीसी अध्यक्ष व आईसीएसएसआर के अध्यक्ष सुखदेव थोराट ,हैदराबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सैयद ई हसनैन जैसों की भी भूमिका रही। सूत्रों के मुताबिक ये अफसर व मास्टर यूपीए -2 सरकार के प्यारे रहे हैं। इनका आपसी लाभालाभ वाला एक अघोषित गुट बन गया है। जो एक  विचाराधारा विशेष को पोषित करने ,तरफदारी करने , बढ़ाने और उसके बदौलत खुद अपनी गोटी  सेट करता रहा है।

 
 कई पूर्व कुलपतियों व आचार्यों का कहना है कि प्रो. दिनेश सिंह ने दिल्ली वि.वि. का कुलपति पद पर रहते हुए कोई अपने मन से 4 वर्षीय स्नातक कोर्स तो लागू  किया नहीं, वह तो वही किये जो उनके आका कहे। हां उस समय उनके आका सोनिया गांधी ,मनमोहन सिंह , कपिल सिब्बल और उसके बाद पल्लम राजू थे ,अब उनके आका नरेन्द्र मोदी , स्मृति जुबिन ईरानी हो गये हैं। दिनेश सिंह इतने तो समझदार हैं ही । उनको अच्छी तरह मालूम है कि किसी भी केन्द्रीय वि.वि. का कुलपति बनने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। जब पद पाने के लिए चरणवंदना किया जाता है ,सिफारिश लगवाया जाता है , तब तो आटोनामी नहीं याद रहती है। और जब निजाम बदल जाता है तब संविधान व आटोनामी की दुहाई देकर मनमानी करने की कोशिश होती है।
दिनेश सिंह जब उस समय अपने आकाओं के इशारे पर 4 साल का स्नात्तक कोर्स शुरू कराये थे तो अब उसे वापस 3 साल करने में क्या हो जा रहा था। उनसे नहीं हो पा रहा था तो पहले ही कुलपति पद छोड़ दिये होते। लेकिन ऐसा वह इसलिए नहीं किये क्योंकि उनको लगता था कि आटोनामी की आड़ में देशी – विदेशी शिक्षा धंधेबाजों को लाभ पहुंचाने वाली 4 वर्षीय स्नातक योजना चला ले जायेंगे। जिसमें मंत्रालय के अफसरों, विभिन्न कमेटियों में कुंडली मारे बैठे रैकेटियर कुछ प्रोफेसरों,संगठनों का भी सक्रिय सहयोग मिल रहा था। कुछ संगठनों ने कहा था कि इस मुद्दे को सर्वोच्चन्यायालय में ले जाकर स्टे ले लिया जाये तो यह सरकार कुछ कर ही नहीं पायेगी । 4 साल का कोर्स जारी रहेगा। पल्लम राजू व शशि थरूर ने मंत्री रहते और उनके अफसरों ने इसी तरह का खेल नेट के पासिंग मार्क कम करने का दबाव बनाने के लिए किया था। एक तरफ कहा जा रहा था कि विश्वविद्यालयों व शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए जरूरी है कि जो लोग पीएचड़ी करें ,शिक्षण में जायें वे प्रतिभाशाली हों। इसके लिए नेट के पासिंग का मार्क अधिक रखा गया था। जिसके कारण बीते वर्ष बहुत से परीक्षार्थी फेल हो गये। उनमें से कुछ ने कई हाईकोर्ट में केस जीत लिया । जिसपर तबके मंत्री थरूर व उच्चशिक्षा अफसरों ने नेट का पासिंग मार्क कम करके परिणाम घोषित करने का दबाव बनाया। लेकिन यूजीसी ने कहा कि हाइकोर्ट के फैसलों के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में जायेंगे। वहां यह मामला गया और यूजीसी ने केस जीत लिया। अब यूपीए सरकार के जाने के बाद से उन अफसरों की लाबी ने खबरें प्लांट कराना शुरू किया कि यूजीसी ने सर्वोच्च न्यायालय में केस लड़ने में इतने लाख रूपये बर्बाद कर दिया। कई लाख रूपये देकर मंहगे वकील किये थे। सवाल यह है कि जब मंहगा वकील नहीं करेंगे तो सर्वोच्च न्यायालय में केस जीतेंगे कैसे। और केस जीतने के लिए बड़ा वकील करना ही पड़ेगा। और  मंत्रालय व यूजीसी ने जो नियम बनाया है उसे लागू कराने,बचाने के लिए केस जीतना ही पड़ेगा। फंड इसके लिए भी तो होता है। अब दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ अध्यापक या उनके संगठन 4 वर्षीय स्नातक कोर्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय गये थे स्टे के लिए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्टे नहीं देकर कहा कि हाइकोर्ट में जाओ। तो हाइकोर्ट में केस .यदि दायर  हुआ तो सुनवाई होगी तो यूजीसी को पैरवी के लिए बड़े वकील करना ही पड़ेगा। उसमें रकम खर्च होगी ही। यदि अच्छा वकील नहीं किया जायेगा तो मंत्रालय व यूजीसी केस हार जायेगा । केस हार जायेगा तो भारत के कई लाख करोड़ रूपये के शिक्षा बाजार पर गिद्ध दृष्टि लगाये अमेरिकी व भारतीय शिक्षा धंधेबाजों व उनके एजेंटों की चांदी हो जायेगी। जिनने लाबिंग करके सोनिया,मनमोहन,मोंटेक व कपिल सिब्बल से पहले दिल्ली वि.वि. में यह 4 वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम शुरू कराया, जिसे बाद में पूरे भारत के विश्वविद्यालयों में लागू कराने की योजना थी।. ज्यादेतर छात्रों व लोगों का कहना है कि ऐसा न होने पाये इसके लिए भारत सरकार को हर हिकमत लगानी पड़ेगी। दिल्ली वि.वि. में शुरू किया गया 4 वर्षीय स्नातक कोर्स चाहे जैसे भी हो खत्म करना ही पड़ेगा और ऐसा कोर्स भारत के किसी अन्य वि.वि. में लागू नहीं हो इसका भी नियम बनाना पड़ेगा। इसके विरोध को हवा दे रहे मंत्रालय के अफसरों,पदाधिकारियों,कमेटियों के अध्यक्षों ,सदस्यों को भी बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए। 
* यह खबर कई समाचार पत्र में छपी है।

Wednesday, June 25, 2014

DESHI-VIDESHI SHIKSHA MAFIYAYON KO LABH PAHUNCHANE KE LIYE D.U. ME SHURU KIYA GAYA 4 VARSHIY GRADUATION COURSE



देशी-विदेशी शिक्षा माफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए शुरू किया गया4 वर्षीय ग्रेजुएशन कोर्स
इसे बंद करके 2 वर्ष का किया जाना चाहिए ग्रेजुएशन
- कृष्णमोहन सिंह
नईदिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में 4 साल का ग्रेजुएशन कोर्स अमेरिका व  भारत की प्राइवेट शिक्षा लाबी को लाभ पहुंचाने के लिए यूपीए 2 में मनमोहन सिंह,मोंटेक सिंह,कपिल सिब्बल,पल्लम राजू ने लागू करवाया था ।  इसे दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू कराने के कुछ साल बाद  पूरे भारत के विश्वविद्यालयों में लागू कराने की योजना थी। ताकि  छात्र जो स्नातक डिग्री 3 साल में लेते थे वह 4 साल  पढ़कर लें। यानी एक साल और समय लगावें। एकसाल और मोटी फीस दें। नौकरी पाने , नौकरी के लिए परीक्षा देने में में एक साल और गंवावें। यानी इस तरह यह 4 वर्षीय स्नातक योजना छात्रों की डिग्री लेने की लाइन और लम्बी करने ,उनको एक साल और उलझाए रखने,एक साल और  बर्बाद करने तथा शिक्षा को कमाई का बड़ा धंधा बना लिये देशी – विदेशी शिक्षा माफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए शुरू किया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय ने जब यह 4 वर्षीय स्नातक कोर्स शुरू किया था ,उस समय इसका बहुत विरोध हुआ था। लेकिन कुलपति दिनेश  ने यूपीए 2 के अपने आकाओं को खुश करने के लिए बहुत बढ़चढ़ कर इसे लागू किया ।
कई पूर्व अर्थशास्त्री व पूर्व कुलपति जो किसी खेमे से नहीं जुड़े हैं उनका साफ शब्दों में कहना है कि शिक्षा पैसा कमाने का एक बहुत बड़ा धंधा बन गया है । भारत में यह कई लाख करोड़ रूपये का कारोबार होने वाला है।  भारत में पहले से ही बेरोजगारी बहुत ज्यादा है , गरीबी है वहां स्नातक का कोर्स तो 3 साल से बढ़ाकर 4 साल करने के बजाय घटाकर 2 साल करना चाहिए।  अमेरिका के कई नामी विश्वविद्यालयों ने कई विषयों की पढ़ाई के लिए तो फीस और  कोर्स का वर्ष  ही घटा दिया है। जैसे ला का कोर्स 3 साल से घटाकर 2 साल का कर दिया। ऐसे में जब अमेरिका यह कर रहा है तो भारत में क्यों इससे उल्टा किया जा रहा है। क्यों नहीं यहां भी ग्रेजुएशन 3 साल की जगह 2 साल का किया जा रहा है। क्यों यहां 3 साल से बढ़ाकर 4 साल किया जा रहा है । इससे साबित होता है कि यह केवल देशी विदेशी शिक्षा माफियाओं की दुकान चलाने के लिए किया जा रहा है।
विश्व की सबसे अधिक युवा जनसंख्या भारत की है। यहां शिक्षा का बहुत बड़ा बाजार विकसित हो रहा है और अगले 50 साल तक तो रहेगा ही। ऐसे में विकसित देशों व अपने देश के शिक्षा के धंधें में लगे उद्योगपतियों,बिल्डरों,नेताओं,अफसरों की गिद्ध दृष्टि यहां  पर लगी हुई है।  जब विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपना कैम्पस खोलने या किसी विश्वविद्यालय के साथ मिलकर कैम्पस शुरू करने के मामले में यूजीसी ने नियम बनाया कि विश्व के टाप200 विश्वविद्यालय ही भारत में अपना कैम्पस खोल सकते हैं या भागीदारी में संस्था शुरू कर सकते हैं, तो इस पर अमेरिकी शिक्षा लाबी ने तबके शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल पर दबाव बनाकर यह नियम बदलवा दिया । क्योंकि इस नियम के कारण अमेरिका के बहुत से विश्वविद्यालय छंट जा रहे थे। जिसके बाद सिब्बल ने 200 की जगह 500 करा दिया। 
इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि खेल मात्र 3 साल के ग्रेजुएशन कोर्स को 4 साल करने का नहीं है। इसके पीछे अमेरिकी व भारतीय शिक्षा लाबी के बड़े धंधे का खेल है।
और जो शिक्षक या शैक्षणिक संस्थाओं में लाबिंग करके मठाधीश बने बैठे लोग कह रहे हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय आटोनोमस बाडी है, वह जो चाहे निर्णय कर सकती है, यूजीसी या मानव संसाधन विकास मंत्रालय उसे डिक्टेट नहीं कर सकते हैं ,ऐसे महानुभाव केवल व केवल कुतर्क कर रहे हैं। ऐसे लोग आईआईटी खड़गपुर के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को देख लें। जिसमें साफ लिखा है कि फंडिग अथारिटी मानव संसाधन मंत्रालय है। वह हर काम की मानिटरिंग कर सकता है,आदेश दे सकता है। आटोनामी का मतलब मनमानी या दादागिरी कत्तई नहीं है।
इसी वजह से अब मांग होने लगी है कि कालेजों, विश्वविद्यालयों में अध्यापकों के सेवानिवृति की उम्र 58 वर्ष किया जाय। शिक्षकों का 10 बजे इंट्री और 5 बजे जाते समय रेटिना अटेंडेंस कम्पल्सरी किया जाये। जो अध्यापक नकल करके शोध पत्र लिखे हैं, पीएचडी थिसिस लिखे हैं , किताबें लिखें हैं ,उसके आधार पर नौकरी या प्रोमोशन पाये हैं उनको तुरंत बर्खास्त किया जाये। जिन कुलपतियों पर कैग ने भ्रष्टाचार का प्रमाण सहित आरोप लगाया है उनके विरूद्ध सीबीआई जांच कराकर घोटाले की रकम बसूला जाये,उन्हें जेल भेजा जाये। अध्यापकों को जब 58 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत किया जायेगा तो जगह खाली होगी इससे उन तमाम प्रतिभाशाली छात्रों को जो पीएचडी करके बेरोजगार घूम रहे हैं ,  नौकरी मिलेगी। उन पर ऐसे युवकों को नियुक्ति मिलेगी। इस तरह बेरोजगारी भी दूर होगी। कुलपतियों को 60 साल की उम्र में सेवानिवृति देदी जाये। किसी भी डिग्री के लिए समय 4 साल ( टेकिनकल को छोड़कर,उनको भी कम करने का उपाय किया जाये)   कत्तई नहीं किया जाय। जो कोर्स चल रहा है उसे आधा प्रैक्टिकल कर दिया जाय , रोजगार से जोड़ दिया जा। दशकों से जो कुछ मुट्ठीभर मठाधीश बने तथाकथित शिक्षा शास्त्री तमाम कमेटियों पर कब्जा जमाये बैठे हैं उनको हटाकर आगे से किसी कमेटी में नहीं रखा जाये , क्योंकि यह एक बहुत बड़ा रैकेट बन गया है।  हर विश्वविद्यालय व कालेज  में सीटें दोगुनी किया जाये, इवनिंग क्लास चलाया जाये, ताकि अधिक से अधिक छात्र पढ़ सकें । 30 छात्र पर एक अध्यापक जैसे फार्मुले केवल धंधा के लिहाज से हैं।  कोचिंग संस्थानों में 500 तक के छात्रों का बैच चलता है । उनमें जो बच्चे पढ़ते हैं उनको जब समझ में विषय आ जाता है तो कालेजों व विश्वविद्यालयों में इतने बड़े क्लास में क्यों नहीं समझ में आयेगा।
.इन वजहों से ही लोग कहने लगे हैं कि  इस लम्बी क्यू वाली 4 साला ग्रेजुएशन कोर्स को तो तुरंत खत्म करके इसे वापस 3 नहीं बल्कि 2 साल का किया जाना चाहिए। और जो अध्यापक इसका विरोध कर रहे हैं उन पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उनसे कह देना  चाहिए कि अपने पैसे से कालेज खोलिए, वहां 4 साल के बजाय 5 साल का ग्रेजुएशन कोर्स चलाइये। 
.# यह खबर कई राज्यों में कई समाचार पत्रों में छपी है।   

Wednesday, April 2, 2014

CORRUPTGURU PROTECTOR & ALLEGED CORRUPT EX V.C. VIBHUTI .....

sattachakra.blogspot.in
03.04.2014
क्या चोर गुरू संरक्षक व भ्रष्टाचार ,घोटाला आरोपी रहे विभूति नारायण राय का भी यह हश्र होगा जो एक घोटालेबाज अफसर विभूति का हुआ है?
विभूति नारायण राय ने जोड़-जुगाड़ से कुलपति बनने के बाद अपने प्यारे चोरगुरू अनिल कुमार राय अंकित को प्रोफेसर नियुक्त करके हेड आदि बना दिया।पुलिस अफसर रहे राय पर कई तरह के घोटाले व भ्रष्टाचार का आरोप कैग ने अपनी रिपोर्ट में लगाया है। जिस पर प्रमाण सहित कम्प्लेन हुआ है तो जो जांच कमेटी बनी थी उसके अफसर से लीपा-पोती वाली रिपोर्ट लगवाने की चर्चा है। लेकिन घोटाले का प्रमाण अपनी जगह कायम है। ऐसे में जिसने लीपा-पोती की रिपोर्ट लगाई है उसके और चोरगुरू संरक्षक,घोटाला आरोपी कुलपति रहे विभूति नारायण राय के विरूद्ध नये सिरे से जांच की मांग शुरू हो गई है।संभावना जताई जा रही है कि ठीक से लगे रहने पर चोरगुरूओं व उनके संरक्षक रहे घोटालेबाज कुलपति विभूतियों का भी वही हश्र हो सकता है जो निम्न विभूति का हुआ है -

नई दिल्ली,3फरवरी2014, (जनसत्ता)। स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व सहायक महानिदेशक को दिल्ली की एक अदालत ने 13 लाख रुपए से ज्यादा की बिना हिसाब किताब की संपत्ति रखने के 17 साल पुराने एक मामले में तीन साल कैद और 75 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।
अदालत ने मंत्रालय के सरकारी मेडिकल स्टोर विभाग में सहायक महानिदेशक के तौर पर काम करने वाले विश्व विभूति को इस पद पर रहने के दौरान अपने और अपने परिवार के नाम पर 72 लाख रुपए से ज्यादा  की राशि जमा करने का दोषी पाया, जबकि निर्दिष्ट अवधि में उसकी ज्ञात आय 58,17,990 रुपए थी। आरोपी को जेल की सजा सुनाते हुए सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश दिनेश कुमार शर्मा ने कहा कि किसी भी तरह का कितना भी भ्रष्टाचार करने वाले को कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि यह संदेश जाए कि भ्रष्टाचार कभी भी फायदे का सौदा नहीं है।   अदालत ने कहा कि अगर भ्रष्ट लोगों को आसानी से जाने दिया जाएगा तो ईमानदार लोक सेवक हतोत्साहित होंगे और उनका मनोबल गिरेगा। आजकल भ्रष्टाचार से समाज में असंतुलन ही पैदा नहीं होता बल्कि इससे एक राष्ट्र के विकास में भी बाधा आती है।’ अदालत ने कहा कि आरोपी ने प्रथम श्रेणी अधिकारी के तौर पर सरकारी सेवा में प्रवेश किया। वह मेडिकल स्टोर विभाग में थे और सरकारी नौकरी में रहते उन्होंने जो संपत्ति एकत्र की वह उनकी आय के ज्ञात श्रोत से अधिक थी।’ न्यायाधीश ने कहा- ‘यह मामला इसलिए और संवेदनशील हो जाता है क्योंकि दोषी (विभूति) को सरकारी अस्पतालों के लिए दवाएं खरीदने के काम पर लगाया गया था और ऐसे पद पर रहते हुए भ्रष्ट कार्य करके संपत्ति जमा करना बहुत गंभीर अपराध है।’अदालत ने हालांकि विभूति की याचिका को स्वीकार करते हुए उसकी सजा पर 12 दिसंबर तक अमल रोक दिया। इस दौरान उसने पांच लाख रुपए का एक जमानती बांड और इतनी ही राशि की दो प्रतिभूति राशि जमा कराई। उसके देश छोड़कर बाहर जाने पर भी रोक लगा दी गई। सीबीआइ ने 15 मई 1996 को विभूति के खिलाफ मामला दर्ज किया था, जिसमें कहा गया था कि जून 1985 से मार्च 1995 के दौरान हैदराबाद और दिल्ली में एडीजी, जीएमएसडी के पद पर रहते हुए उन्होंने अपने और अपने परिवार के नाम पर भारी संपत्ति एकत्र की। विभूति को जुलाई 1996 में निलंबित कर दिया गया। उस समय वह कोलकाता में एडीजी था। छानबीन के बाद जुलाई 1998 में उसके खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया गया। विभूति को भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत दोषी पाया गया। अदालत ने सीबीआइ की भी खिंचाई करते हुए जांच एजंसी के जांच के तरीके पर सवाल उठाया।

Tuesday, March 4, 2014

CORRUPT HIGHER EDUCATION / KITANA BHRAST HO GAYA HAI UCHCH SHIKSHA TANTR


sattachakra.blogspot.com
date04-03-2014, 09.25P.M.
कितना भ्रष्ट हो गया है उच्च शिक्षा तंत्र
-कृष्णमोहन सिंह
नई दिल्ली। उ.प्र. कैडर के आएएस  अफसर अनंत सिंह मानव संसाधन विकास मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे और उच्च शिक्षा देख रहे थे।  यह उन अफसरों में से हैं जिनपर  उत्तर प्रदेश की मुलायम सरकार में मुजफ्फर नगर में उत्तराखंड के आंदोलकारियों पर गोली चलवाने आदि का आरोप लगा था। तब आईपीएस अफसर विभूति नारायण राय जो सत्ता , पद आदि लाभ के लिए वामपंथी आदि बनते रहे हैं, भी उ.प्र. में ही तैनात थे। वामपंथियों आदि के यहां गणेश परिक्रमा कर जुगाड़ लगाकर जब विभूति नारायण राय (वीएन राय), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय , वर्धा में कुलपति बने तो चोरगुरू अनिल कुमार राय को प्रोफेसर नियुक्त कर दिये। पुलिसिया कुलपति  विभूति नारायण राय ने  अपने  चहेते चोरगुरू को तो प्रोफेसर, हेड बनाया ही उन पर कैग ने करोड़ो रूपये के घोटाला का भी आरोप लगाया है। जिसके जांच के लिए कई लोगों ने यूजीसी, मानव संसाधन विकास मंत्रालय,प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को सप्रमाण पत्र लिखा है।सीवीसी ने इसके जांच का आदेश दिया था जिसको मानव संसाधन विकास मंत्रालय के जांच अधिकारी को पटाकर रफा-दफा कराने की चर्चा है। इतना सब होने के बावजूद महाजुगाड़ी वीएन राय ने  सर्च कमेटी में अपने में चर्चित कपिला वात्स्यायन और अपने एक और चहेते को रखकर अपना नाम भी जुड़वा लिया था। जबकि राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त सर्च कमेटी के अध्यक्ष व मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव  अशोक वाजपेई ने वात्स्यान और उनके ही मिजाज वाले एक भ्रष्टाचारी संरक्षक  द्वारा घोटाला आरोपी व चोरगुरू संरक्षक वीएन राय का नाम रिकमेंड करने पर लिखित में विरोध दर्ज करके रिपोर्ट जमा किया था।उसके बाद भी सर्च कमेटी ने जो नाम सुझाये थे उसमें से किसी को वर्धा का कुलपति नहीं नियुक्त करके इसी भ्रष्टाचार आरोपी वीएन राय को नये कुलपति  की नियुक्ति तक कुलपति बनाये रखने की व्यवस्था कर दी गई। कहा जाता है कि राय ने यह सब अनंत सिंह के सहयोग से कराया था। जिसके बाद इन सब का व्यौरा देते हुए अनंत  सिंह का कार्यकाल पूरा होते ही वापस   उ.प्र. कैडर में भेजने का पत्र राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री व मानव संसाधन विकास मंत्री को गया। ताकि किसी न किसी बहाने और एक्सटेंशन पाने का जुगाड़ लगा रहे अनंत  सिंह मानव संसाधन विकास मंत्रालय में नहीं रहने पावें।  उसके बाद उनको एक्सटेंशन नहीं मिला । जिसके कारण उनको दिसंबर 13 के अंतिम सप्ताह में  मानव संसाधन मंत्रालय से विदा होना पड़ा।
चोर गुरू संरक्षक व घोटाला आरोपी विभूति नारायण राय के वही संरक्षक व सहयोगी बन गये थे। सो उनके जाने के बाद वीएन राय के जुगाड़ की मुख्य कड़ी ही टूट गई। उसके बाद  वीएन राय के विरूद्ध राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,मानव संसाधन विकास मंत्री के यहां प्रमाण सहित शिकायत गई कि जिस आदमी पर घोटाला व भ्रष्टाचार के इतने आरोप हैं  , उसको अभी तक कुलपति पद पर क्यों और कैसे बनाये रखा गया है। जबकि उसका कार्यकाल खत्म हो गया है और सर्च कमेटी ने कई नाम की सूची दे दी है। उनमें से किसी को क्यों नहीं नियुक्त किया जा रहा है। इस भ्रष्टाचार आरोपी को अपने किये घोटाले व भ्रष्टाचार को रफा – दफा कराने के लिए समय क्यों दिया जा रहा है।उसके बाद 28जनवरी 14 को वीएन राय की वर्धा के कुलपति पद से हटाने का आदेश हुआ। वरना वह तो दूसरा टर्म पाने के जुगाड़ में साम-दाम,जी-जान से जुटे थे।उधर वर्धा में विद्यानिवास मिश्र के भाी को कुलपति बना दिया गया। उनको भी पटाने के लिए चोरगुरू अनिल कुमार राय उर्फ अनिल के राय अंकित लग गया है।
इसी तरहसे कई केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतिलोग जिनका कार्य काल खत्म हो गया था मंत्रालय के अफसरों , मंत्रियों को किसी न किसी तरह से खुश करके पद पर बने हुए थे। जब इनकी भी प्रमाण सहित शिकायत राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री आदि के यहां हुई तब पल्लम राजू और उच्च शिक्षा सचिव ठाकुर के न चाहने के बावजूद 1 मार्च 14 को सबकी  छुट्टी करनी पड़ी और अगले कुलपति की नियुक्ति तक उनके चार्ज विश्वविद्यालयों के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसरों को देने का आदेश देना पड़ा।  शिक्षा का पूरा तंत्र किस तरह भ्रष्ट हो गया है और कैसे चल रहा है , इसका यह एक छोटा सा प्रमाण है।