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Wednesday, January 21, 2015

Rajypal Ram Naik ji , Professors ko sevanivrit 58 par karen.chorguruyo , unako bachane,unase sauda karane valon ko barakhast karen



sattachakra.blogspot.com
उ.प्र. के राज्यपाल राम नाईक जी ! सभी प्रोफेसरों ,कुलपतियों आदि की सेवानिवृति उम्र 58 करें,ताकि बेरोजगारों को नौकरी मिले ।
राज्य के सभी प्रोफेसरों, रीडरों, लेक्चररों के शोध पत्र, पीएचडी,डिलिट थिसिस, पुस्तकों की जांच करायें , जो नकल करके लिखे हों उनको बर्खास्त करें,जेल भेजवायें। जो नेट का फर्जी प्रमाण पत्र लगाकर महाविद्यालयों ,विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहें हैं,उनकी जांच कराकर जेल भेजवाइये।इसके बारे में काशी विद्यापीठ ,वाराणसी के कुलपति और वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल वि.वि. के कुलपतियों से पूछें कि वहां कैसे चोरगुरूओं को बचाया,क्लिनचीट और प्रमोशन दिलवाया गया।  विद्यापीठ में कैसे चोरगुरू से सौदा कर लिया गया।कैसे काशी विद्यापीठ के  तथाकथित जातिवादी व राजनीतिक चोला बदलने में माहिर जुगाड़ी कुलपति ने अपने  प्रोफेसर चोरगुरू को सेवानिवृत हो जाने दिया।
किसी को उदाहरण चाहिए तो देखे कि कैसे चंडीगढ़ उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि 58 साल में सेवानिवृत होंगे कर्मचारी।
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58 साल में ही रिटायर होंगे कर्मचारी
Jan 21, 2015, 06.30AM IST
http://navbharattimes.indiatimes.com/state/punjab-and-haryana/chandigarh/employees-will-retire-in-58-years/articleshow/45956923.cms
प्रमुख संवाददाता, चंडीगढ़
हरियाणा के सरकारी कर्मचारी 58 साल की उम्र में ही रिटायर होंगे। हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने संबंधी कर्मचारियों की याचिका को खारिज कर दिया। यह कर्मचारी वर्ग के लिए एक बड़ा झटका है। रिटायरमेंट एज को बीजेपी सरकार ने 60 से घटाकर 58 कर दिया था। 60 साल में रिटायरमेंट करने का फैसला पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार ने अपने शासनकाल के अंतिम दिनों में लिया था।
कर्मचारियों ने कुछ समय पहले मौजूदा बीजेपी सरकार के रिटायरमेंट एज घटाने संबंधी फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इन कर्मचारियों को पूर्ववर्ती सरकार ने शासनकाल के अंतिम दिनों में रिटायरमेंट एज बढ़ाकर एक बड़ा तोहफा दिया था। कर्मचारी खुश थे लेकिन मौजूदा सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार के तमाम फैसलों की समीक्षा करने का हवाला देते हुए पूर्व सरकार के फैसले को पलट दिया था।
अदालत पहुंचे कर्मचारियों ने अपनी याचिका में इस बात को आधार बनाया था कि बीजेपी सरकार ने राजनीतिक कारणों से रिटायरमेंट एज घटाई है। इनका यह भी कहना था कि आईएएस, ज्यूडिशरी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में रिटायरमेंट की उम्र 60 साल है तो इसी को आधार बनाकर पूर्व सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 58 से बढ़ाकर 60 की थी। इस कर्मचारियों का एक आधार यह भी था कि रिटायरमेंट की उम्र को घटाने वाली खट्टर कैबिनेट में सदस्यों की संख्या कम होने के कारण यह असंवैधानिक है। इस तरह रिटायरमेंट की उम्र को घटाने का फैसला भी पूरी तरह गलत है।
दूसरी ओर मनोहर लाल खट्टर सरकार ने अपने फैसले को पूरी तरह कानून सम्मत करार देते हुए इसे वाजिब करार दिया था। कर्मचारियों को अदालत से मामले में न्याय मिलने की आस थी। सबसे ज्यादा दिलचस्पी उन कर्मचारियों को लगी रही जो आने वाले समय में रिटायर होने वाले हैं।
पिछली सरकार पर सवाल खड़े
हाईकोर्ट ने रिटायरमेंट एज घटाने के मौजूदा सरकार के फैसले को जायज ठहराते हुए पूर्ववर्ती सरकार के समय लिए गए फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट का मानना था कि राज्य में चुनाव होने वाले थे और आदर्श चुनाव आचार संहिता भी लागू होने वाली थी। ऐसे में तत्कालीन सरकार द्वारा रिटायरमेंट एज पर फैसला लेने से ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक विशेष वर्ग का वोट हासिल करने के लिए किया गया था। अदालत का यह भी मानना था कि पूर्व सरकार ने इस बारे में केवल दिशा निर्देश दिए थे और उन्हें विधायी नहीं माना जा सकता। ऐसे में कर्मचारियों को 60 साल की रिटायरमेंट एज बढ़ाने का अधिकार ही नहीं बनता था।

Thursday, September 26, 2013

RAJYPAL KE CHAHETE NAG KA KARNAMA,CHORGURU KO PROF BANAYA,UGC NE EDUCATIONAL CORRUPTION PAR CLEARFICATION MANGA



sattachakra.blogspot.in
date26-09-2013,09.55A.M.
यह खबर " लोकमत"लखनऊ में 25-09-2013 को पहले पन्ने पर छपी है।
RESITRAR S.L.MAURYA LETTER P-1

RESITRAR S.L.MAURYA LETTER P-2

ENQUIRY REPORT P-1

ENQUIRY REPOT P-2

CASE PENDING,DATE 26.09.2013

CM,UGC,ORDER

ANIL KUMAR UPADHYAY

PRITHVISH NAG

SAHAB LAL MAURYA
OM PRAKASH SINGH


राज्यपाल के चहेते नाग का कारनामा
हाईकोर्ट में फैसला हुआ नहीं,समझौता दिखा चोरगुरू को प्रोफेसर बनाया
यूजीसी अध्यक्ष ने शैक्षणिक कदाचार पर स्पष्टीकरण मांगा   
-कृष्णमोहन सिंह
नईदिल्ली।उ.प्र. के राज्यपाल बी.एल.जोशी के चहेते कुलपति पृथ्वीश नाग और कुलसचिव साहब लाल मौर्य ने नकल करके डी.लिट. और किताब लिखने वाले डा.अनिल कुमार उपाध्याय को मनमाने तरीके से प्रोफेसर बना दिया। इसके लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला आये बिना ही( कोर्ट नं. 44 में अगली तारीख(संभावित) 26-09-2013 है),उसके  मेडिएशन सेंटर में 06-04-13 को दो व्यक्तियों(डा.ओम प्रकाश सिंह और डा. अनिल कुमार उपाध्याय) के आपसी समझौते(चर्चा है कि वह भी अभी फुलफिल नहीं हुआ है) को आधार बनाया है।और उसके आधार पर डा.अनिल कुमार उपाध्याय को विश्वविद्यालय के अध्यापक के रूप में किये शैक्षणिक कदाचार,शिक्षक आचार संहिता का उल्लंघन,धोखाधड़ी आदि से क्लीनचिट दे दिया है। जबकि दो व्यक्तियों के आपसी समझौते का इस मामले में कोई लीगल वैल्यू नहीं है। और इस समझौते से डा. अनिल उपाध्याय का शैक्षणिक कदाचार (एजुकेशनल मिसकंडक्ट),शिक्षक आचार संहिता का उल्लंघन,धोखाधड़ी आदि का अपराध खत्म नहीं हो जाता है। वह भी इस हालत में जबकि चर्चा है कि उस समझौते में अनिल कुमार उपाध्याय ने लिखित में स्वीकार किया है कि ओम प्रकाश सिंह के पुस्तक से सामग्री हूबहू उतारी है।  
मालूम हो कि डा.अनिल कुमार उपाध्याय ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में अध्यापक के पद पर रहते हुए ओम प्रकाश सिंह के पी.एचडी. थीसिस से सामग्री हूबहू उतारकर अपनी डी.लिट. की थीसिस लिखा है । जिसको पुस्तक के रूप में भी छपवाया है।डा. ओम प्रकाश सिंह भी इसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। यानी एक ही विश्वविद्यालय के एक अध्यापक के पी.एचडी. थीसिस से सामग्री हूबहू उतारकर दूसरे अध्यापक ने डी.लिट.थीसिस लिख लिया , किताब लिख लिया, और उसी विश्वविद्यालय से डी.लिट. की उपाधि ले लिया।   उसके इस नकलचेपी कारनामे को प्रमाण सहित एक टीवी चैनेल में चोरगुरू कार्यक्रम में दिखाया गया।जिस पर सांसद राजेन्द्रसिंह राणा,हर्षवर्धन सहित कई सांसद  व सामाजिक कार्यकर्ता आदि ने राष्ट्रपति, राज्यपाल ,प्रधानमंत्री,यूजीसी चेयरमैन,कुलपति ,कुलसचिव को 2009 से लगातार प्रमाण सहित पत्र लिखकर अनिल कुमार उपाध्याय व अन्य चोरगुरूओं को  अध्यापक के पद से बर्खास्त करने की मांग करते रहे हैं। इसके बावजूद काशी विद्यापीठ के कुलपति व कुलसचिव ने बेशर्मी व मनमाने तरीके से चोरगुरू डा.अनिल कुमार उपाध्याय को बचाते हुए प्रोफेसर बना दिया। इस बारे में 2009 से पत्र लिखते रहे सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश गोदुका ने यूजीसी अध्यक्ष,राज्यपाल,कुलपति,कुलसचिव को पत्र लिखा था कि चोरगुरू अनिल कुमार उपाध्याय को प्रोफेसर बनाने के लिए किया जा रहा साक्षात्कार स्थगित कराया जाय और उनके शैक्षणिक कदाचार पर कार्रवाई करते हुए उनकी डी.लिट. की डिग्री रद्द की जाय,नौकरी से बर्खास्त किया जाय । लेकिन अनिल कुमार उपाध्याय को संरक्षण देकर    शैक्षणिक कदाचार को बढावा देने में लगे कुलपति नाग और कुलसचिव साहब लाल ने उनको प्रोफेसर बना दिया। यूजीसी ने 18-07-2013 को पत्र संख्या F-54-4/2010(SU-II) के मार्फत कैलाश गोदुका के कई पत्रों में से 20-06-2013 वाले पत्र पर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ,वाराणसी से जवाब मांगा तो कुलसचिव साहब लाल मौर्य ने यूजीसी के अनु सचिव को दिनांक 12-08-2013 का लिखा दो पृष्ठ का पत्र (पत्रांक – कु.स./8457/ 2A साप्र 1(जांच)/ 2013 भेजा।इसके साथ 4 पृष्ठ दस्तावेज भी भेजा। यूजीसी के अनुसचिव श्रीमति परमजीत ने एक पृष्ठ के कवरिंग लेटर के साथ उसकी प्रति दिनांक 6-09-2013 को कैलाश गोदुका के यहां भेज दिया।उसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के मेडिएशन और कानसिलिएशन सेंटर में किये सेटलमेंट एग्रीमेंट का मात्र एक पृष्ठ लगाया गया है,बाकी पृष्ठ नहीं जिससे कि अनिल कुमार उपाध्याय ने  क्या क्या कबूला है ,खुलासा नहीं हो सके। साहब लाल के पत्र के साथ अनिल उपाध्याय के शैक्षणिक कदाचार की जांच की 2 पृष्ठ की रिपोर्ट भी है। चोरगुरू अनिल उपाध्याय के शैक्षणिक कदाचार का लिखित शिकायत देने और आन कैमरा प्रमाण दिखाने के कई माह बाद तबके कुलपति अवध राम के आदेश पर 7 अप्रैल 2010 को प्रो.टी.सिंह(त्रिलोकी सिंह) की अध्यक्षता में 4 सदस्यों वाली जांच समिति गठित की गई। जिसमें प्रो.शिशिर बसु,प्रो.आरपी सेन और प्रो. नन्दलाल को सदस्य बनाया गया। प्रो.बसु ने मना कर दिया तो अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. के  प्रो. सफी किदवई को उनकी जगह सदस्य बनाया गया। इसकी पहली बैठक 19-01-2011 को हुई, जिसमें टी.सिंह,किदवई,नन्दलाल शामिल हुए। किदवई की अनुपस्थिति में दूसरी व अंतिम बैठक 23-07-2013 को हुई जिसमें अध्यक्ष टी.सिंह,और संयोजक नन्द लाल (दोनों कुरमी हैं और नंद लाल के विरूद्ध झारखंड पीसीएस की कापी में नम्बर बढाने के मामले में सीबीआई जांच चल रही है) शामिल हुए ।और दोनों ने 15-08-2013 को अंतिम रिपोर्ट लगा दी।  जिसका शीर्षक है- डा. अनिल कुमार उपाध्याय,रीडर,पत्रकारिता विभाग के शैक्षणिक कदाचार (विवादित – डी.लिट. थीसिस) की जांच हेतु गठित समिति की रिपोर्ट
इसमें है कि अध्यक्ष और संयोजक  की उपस्थिति में समिति ने अंतिम रूप से निम्नांकित निर्णय लिए-
1-      विधिक राय पर विचार करते हुए समिति ने यह निर्णय लिया कि शिकायत कर्ता अपनी पुस्तक से संबंधित शिकायत का निस्तारण इंडियन कापी राइट एक्ट के तहत यथोचित प्राधिकरण से कर सकता है, तथा
2-      डा. अनिल उपाध्याय की डी.लिट. थीसिस तीन विषय विशेषज्ञों की संस्तुति पर पहले ही एवार्ड की जा चुकी है । यह विश्वविद्यालय की सर्वोच्च उपाधि है। समिति का यह मानना है कि इस शोध – प्रबंध से संबंधित कोई भी प्रकरण / बिन्दु विषय विशेषज्ञों को ही संदर्भित किया जाना चाहिए।


इस तरह अपने दोनों विरादर के  मार्फत कुलपति अवध राम ने शैक्षणिक कदाचारी डा.अनिल कुमार उपाध्याय के जांच की लीपापोती करवा दी।
और इस जांच रिपोर्ट को संतोषजनक नहीं मानते हुए विश्वविद्यालय ने कार्यपरिषद के सदस्य प्रभाकर झा की अध्यक्षता में एक दूसरी जांच समिति भी गठित करवा दी,जिसकी रिपोर्ट अभी भी प्रतीक्षित है। जिसका जिक्र कुलसचिव साहब लाल के पत्र के पैरा 2 के अंत में है।
अपने पत्र के पृष्ठ 1 के पैरा 3 में साहब लाल क्या लिखते हैं  देखिये – .. यह भी कि इसी मध्य प्रो. ओम प्रकाश  सिंह के अभिलेखों की चोरी कर अपने नाम से प्रकाशित करने  के तथाकथित प्रकरण पर माननीय उच्च न्यायालय में डा. अनिल कुमार उपाध्याय द्वारा वाद में  प्रो. ओम प्रकाश सिंह एवं डा. अनिल कुमार उपाध्याय के बीच सुलह/ समझौता हो चुका है जो संलग्न 2 पर अवलोकनीय है जिससे स्पष्ट है कि प्रो. ओमप्रकाश सिंह का डा. अनिल कुमार उपाध्याय पर अब अभिलेखों  के चोरी  का कोई विवाद नहीं है। अब जबकि  प्रो. ओम प्रकाश सिंह का अपने अभिलेखों से चोरी का अब कोई विवाद नहीं है तो अन्य कोई यह आरोप कैसे लगा सकता है।
प्रत्यावेदन की प्रस्तरवार आख्या अधोलिखित प्रकार है :
उपर्युक्त सम्पूर्ण वस्तुस्थिति से स्पष्ट है कि प्रत्यावेदक द्वारा डा. उपाध्याय की प्रोन्नति को रोकने के उद्देश्य से समस्त कार्वाही की गई है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि डा. उपाध्याय के साथ प्रत्यावेदक का कोई व्यक्तिगत रंजिश या प्रतिद्वंदिता है। अत: प्रशनगत शिकायत विचारणीय न होकर निरस्त करने योग्य है। भवदीय –डा.(साहब लाल मौर्य),कुलसचिव ।
विश्वविद्यालय के कुलपति नाग ,कुलसचिव साहब लाल द्वारा शैक्षणिक कदाचारी को इस तरह से मनमाने तरीके से  संरक्षण व प्रोन्नति देते हुए बेशर्म तर्क देने वाला पत्र वाया अंडर सेक्रेटरी यूजीसी, दिनांक 12-09-2013 को पाने के बाद कैलाश गोदुका ने उनके इस कारनामे के विरूद्ध 15-09-2013 को अध्यक्ष,यूजीसी,कुलपति पृथ्वीश नाग,कुलसचिव साहब लाल मौर्य ,राज्यपाल और मुख्यमंत्री उ.प्र. को 5 पृष्ठ का पत्र लिखा और उसके साथ साहब लाल का पत्र व संलग्न दस्तावेज 7 पृष्ठ लगाकर पहले ई-मेल  उसके बाद रजिस्ट्री करके कार्रवाई करने की मांग की। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष ने उस पर दिनांक 20-09-2013 को ज्वाइंट सेक्रेटरी ( स्टेट यूनिवर्सिटी) को  निम्न आदेश दे दिया – प्लीज सीक द क्लीयरिफिकेशन फ्राम द यूनिवर्सिटी एबाउट (I)एजुकेशनल करप्शन, एंड (II) प्लेगरिज्म। देखिए आगे क्या होता है।
DATE26.09.2013,09.55A.M.