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Monday, June 24, 2013

NAKAL KARAKE D.LIT KARANE VALE ANIL UPADHYAY KO KASHI VIDYAPEETH ME PROF BANANE KI TAIYARI



sattachakra.blogspot.in , 24-06-2013 , 4.45 a.m.


यह खबर " लोकमत "  , लखनऊ में 23 जून 2013 को पहले पन्ने पर छपी है।

नकल करके डीलिट करने वाले अनिल उपाध्याय को काशी विद्यापीठ में प्रोफेसर बनाने की तैयारी
राजभवन , यूजीसी व कुलपति,रजिस्ट्रार के सहयोग से  भ्रष्टाचारी को बर्खास्त नहीं करके की जा रही है पदोन्नति  
GOVERNOR  B.L. J0SHI
सांसद हर्षवर्धन, सांसद राजेन्द्र राणा, कैलाश गोदुका आदि के लगातार प्रमाण सहित शिकायत करने के बावजूद यह किया जा रहा है
-कृष्णमोहन सिंह
VC DR. PRITHVISH NAG
.
REGISTRAR SAHAB LAL MAURYA

CORRUPTGURU DR. ANIL KUMAR UPADHYAY
नईदिल्ली। नकल करके डीलिट थीसिस लिखने और पुस्तक के रूप में छपवाने वाले महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ,वाराणसी के पत्रकारिता विभाग के डा.अनिल कुमार उपाध्याय को रीडर से प्रोफेसर बनाया जा रहा है। उ.प्र. के राज्यपाल,यूजीसी के अध्यक्ष, काशी विद्यापीठ के कुलपति से लगायत राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री,मानव संसाधन विकास मंत्री को अन्य चोरगुरू प्रोफेसरों, रीडरों,लेक्चररो के अलावा अनिल उपाध्याय के शैक्षणिक कदाचरण,  दुराचरण ,नकलचेपी कारनामे की प्रमाण सहित शिकायत सांसद हर्ष वर्धन,सांसद राजेन्द्रसिंह राणा, कैलाश गोदुका, ओमप्रकाश सिंह जिनकी पीएचडी थीसीस से नकल किया है , व अन्य लोग 2010 से करते आ रहे हैं। एक टीवी चैनल पर भी  चोरगुरू शीर्षक से  इन शैक्षणिक कदाचारियों के भ्रष्टाचार व नकलचेपी कारनामों के बारे में सप्रमाण दिखाया गया था।इसके बावजूद ऐसे कदाचारी शिक्षकों को बर्खास्त करने के बजाय  बचाने और प्रोमोशन देने का उपक्रम किया जा रहा है।
सांसद हर्षवर्धन ने इस बारे में उ.प्र. के राज्यपाल को 27 फरवरी 2010 को  पत्र लिखा था – ...हमारे उच्च शिक्षा के मंदिरों में इस तरह की अनैतिक और आपराधिक  गतिविधियों को जानकर मैं आपको यह पत्र लिखने को विवश हुआ हूं। उससे भी अधिक दुख की बात यह है कि इन विश्वविद्यालय के प्रशासन द्वारा इस प्रवृति को रोकने की सशक्त कोशिश के बजाय दोषियों को बचाने की ही कोशिश होती दिखाई दे रही है।....
हर्षवर्धन ने 8 नवम्बर 2012 को उ.प्र. के राज्यपाल से सुबह 11 बजकर 20 मिनट पर मुलाकात करके उ.प्र. के कई विश्वविद्यालयों के  चोरगुरूओं के कदाचरण,शैक्षणिक कदाचार का प्रमाण देकर उनको बर्खास्त करने का आग्रह वाला  जो पत्र दिया था उसमें डा.अनिल कुमार उपाध्याय के शैक्षणिक कदाचार,नकलचेपी कारनामे का भी प्रमाण था। जिसमें लिखा था – ...आपसे ( राज्यपाल) आग्रह है कि जिन प्राध्यापकों पर शैक्षणिक कदाचार ,नकल करके पुस्तकें लिखने,पीएचडी शोध प्रबंध लिखने आदि का प्रमाण सहित आरोप लगा है  , उनके विरूद्ध एक उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित कर उनकी पुस्तकें प्रकाशित एवं वितरित करने वालों और प्राध्यापकों  के नकलचेपी कारनामे,शैक्षणिक कदाचार उजागर करनेवालों को भी बुलाया जाय। जांच की समयावधि सुनिश्चित करके ऐसे शैक्षणिक कदाचार करने वाले प्राध्यापकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। ज्ञातब्य हो कि एक ऐसे ही मामले में प्रमाण सहित शिकायत के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया , दिल्ली के  रीडर डा. दीपक केम को जामिया प्रशासन ने 13 जून 2011 को बर्खास्त कर दिया । दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस बर्खास्तगी को 10 अप्रैल 2012 को अपने फैसले में जायज ठहराया है
हमें खेद है कि काशी विद्यापीठ और पूर्वांचल वि.वि. में जांच के नाम पर लीपापोती की जा रही है। तर्क दिया जा रहा है  कि जिसके पुस्तक से सामग्री चुराया गया है वह शिकायत करे , केस, करे, न्यायालय निर्णय करेगा। यानी चोरी करके पीएचडी शोध व पुस्तकें लिखने वालों , शैक्षणिक कदाचारियों को वि.वि. प्रशासन लेक्चरर,रीडर,प्रोफेसर बनाता रहे, पदोन्नति करता रहेगा लेकिन ऐसे चोरगुरूओं व शैक्षणिक कदाचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगा। इस कृत्य से विद्यार्थियों व शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में गलत संदेश जा रहा है और अनैतिक व भ्रष्ट प्राध्यापकों को बढ़ावा मिल रहा है।...
इसके बाद राज्यपाल ने 30 नवम्बर 2011 को उनसभी  विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को पत्र भेजवाया था जिसमें  शैक्षणिक कदाचारियों  के विरूद्ध जांच कराने के लिए लिखा था।  उस पत्र का संदर्भ देते हुए सांसद हर्षवर्धन ने कुलपति , महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ  को 15 दिसम्बर 2012 को 2 पेज का पत्र लिखा था यह कि-

.... महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ , वाराणसी के पत्रकारिता विभाग में रीडर डा. अनिल कुमार उपाध्याय द्वारा अपनी डीलिट थीसिस (इसी विश्वविद्यालय के एक अन्य पत्रकारिता विभाग, महामना मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता संस्थान के निदेशक) में  ओमप्रकाश सिंह की पीएचडी की थीसिस, संचार माध्यमों का प्रभाव  से काफी सामग्री हूबहू उतारकर पहले डी.लिट थीसिस लिखी और बाद में उसे पत्रकारिता एवं विकास संचार पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया है।
 संबंधित कृत्य से शिक्षा जगत दूषित हो रहा है। यह वास्तव में बौद्धिक समाज के बुद्धि चोर हैं। आपसे आग्रह है कि अपने स्तर से इस मामले में प्रभावी कार्रवाई करें।
 इसी तरह का पत्र सांसद राजेन्द्रसिंह राणा ने  भी लगातार लिखा है। लेकिन काशी विद्यापीठ के कुलपति पृथ्वीश नाग ने एक शैक्षणिक कदाचारी, दुराचरणी प्रो. राममोहन पाठक के विरूद्ध कोई कार्रवाई नहीं करके उसको सेवानिवृत्त हो जाने दिया। और दूसरे चोरगुरू शैक्षणिक कदाचारी , दुराचरणी डा. अनिल कुमार उपाध्याय को  प्रोफेसर बनाने के लिए साक्षात्कार की खानापूर्ति करा रहे हैं। 24 जून 2013 को एक्जक्यूटिव कमेटी की बैठक कराकर 25 या 26 तक उपाध्याय को प्रोफेसर पद का पत्र दे देंगे। अनिल उपाध्याय को प्रोफेसर बनाये जाने की प्रक्रिया रोकने के लिए दिल्ली के वकील राजीव रंजन और अरविंद केजरीवाल के साथ परिवर्तन नामक संस्था  शुरू करने वाले कैलाश गोदुका ने 20 जून 2013 को राज्यपाल उ.प्र.,कुलपति व कुलसचिव महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ  और अध्यक्ष यूजीसी को शिकायती पत्र ई-मेल किया , उनके कार्यालयों में जमा कराया । इसके बावजूद इनसबके मिलिभगत से चोरगुरू व शैक्षणिक कदाचारी अनिल उपाध्याय को प्रोफेसर बनाया जा रहा है।इससे साबित होता है कि शैक्षणिक भ्रष्टाचारियों व भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने में इन सबका सहयोग है। और राज्यपाल,यूजीसी चेयर मैन, इनके मातहत अफसरान ,केन्द्र व राज्य के शिक्षा विभाग के आला अफसर व हुक्मरान जानबूझकर  ऐसा करने दे रहे हैं।   

Sunday, June 23, 2013

chorguru anil upadhyay ne o.p. singh ki kitab se katpest karake kaise likhi hai d.lit thesis/ kitab

sattachakra.blogspot.com
23-06-2013, 10.15 , a.m.

corrupt guru dr. anil upadhyay
 corrupt guru's protector vc dr. prithvish NAG
-के.एम.एस
नईदिल्मली।हात्मा गांधी काशी विद्यापीठ,वाराणसी  के पत्रकारिता विभाग  के रीडर , हेड , चोरगुरू ,शैक्षणिक कदाचारी  डा. अनिल कुमार उपाध्याय ने इसी विश्वविद्यालय के महामना मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता संस्थान के प्रोफेसर ओम प्रकाश सिंह की पीएचडी थीसिस से पेज के पेज, काफी  सामग्री हूबहू कटपेस्ट करके अपनी डीलिट की थीसिस लिखी। और एशिया में पत्रकारिता में पहला डीलिट होने का दावा करने लगे । लेकिन कत्तई यह दावा नहीं किया कि इस डीलिट की थीसिस की ज्यादेतर सामग्री किसी और के पीएचडी थीसिस से हूबहू नकल करके उतार दिया है। कटपेस्ट करकेडीलिट थीसिस बनाया है।और इसकी पुस्तक  भी छपवा लिया है।नकल करके , कटपेस्ट करके बनाई गई इस पुस्तक का नाम है  "पत्रकारिता एवं विकास संचार "। प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने भी अपनी पीएचडी थीसिस को पुस्तक के रूप में छपवाई है जिसका नाम है "संचार माध्यमों का प्रभाव "। यहां पहले यह प्रमाण  दिया  जा रहा कि ओमप्रकाश सिंह की पुस्तक "संचार माध्यमों का प्रभाव" के किस पेज से  किस पेज तक की सामग्री डा. अनिल उपाध्याय की पुस्तक "पत्रकारिता एवं विकास संचार" के किस पेज से किस पेज तक है। इसके बाद एक तरफ ओमप्रकाश की पुस्तक का पेज , दूसरी तरफ डा. अनिल उपाध्याय की पुस्तक का वही कटपेस्ट का प्रमाण वाला पेज दिया जायेगा। उसके बाद ओमप्रकाश की पीएचडी थीसिस का पेज और उसको कटपेस्ट करके अनिल उपाध्याय ने अपनी डीलिट का जो पेज बनाया है उसे आमने -सामने दिया  जायेगा। ताकि डा. अनिल कुमार उपाध्याय के नकलचेपी,शैक्षणिक कदाचार का प्रमाण विश्वविद्यालयों के छात्रों, कर्मचारियों , अध्यापकों,आम जनता व धृतराष्ट्र बनकर इस शैक्षणिक कदाचारी को बचा रहे ,प्रोमोशन दे रहे कुलपति पृथ्वीश नाग, कुलसचिव साहब  लाल मोर्या , राजभवन उ.प्र. के आला अफसर व उनके आका , यूजीसी के आला अफसर व उनके आका बार -बार देख सकें  और यह सब भ्रष्टाचारी गुरू अनिल उपाध्याय की डीलिट डिग्री रद्द करने , उनके विरूद्ध कड़ी कार्रवाई का कुछ आधार बन सके।  
       तो पहले देखें ओमप्रकाश की पुस्तक के पेज और चोरगुरू अनिल उपाध्याय की पुस्तक के पेज का चार्ट (3 पेज )जो साबित करता है कि चोरगुरू ,शैक्षणिक कदाचारी   डा. अनिल कुमार उपाध्याय ने कटपेस्ट करकेकिताब बनाया है। अनिल उपाध्याय की पुस्तक  का पहला संस्करण 2001 में, दूसरा संस्करण 2007 में छपा है। दोनों में डा. अनिल  कुमार उपाध्याय द्वारा किये गये नकलचेपी कारनामे का प्रमाण चार्ट में है।